Gen Z Protests: देश के अलग-अलग हिस्सों में पिछले महीने हुए छात्र प्रदर्शनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने संकेत दिया कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द किया जा सकता है। इन प्रदर्शनों में परीक्षा पेपर लीक समेत छात्रों से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए थे।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे लोगों को राहत नहीं दी जाएगी, जिनका पहले से गंभीर अपराधों का रिकॉर्ड है और जिन्होंने कथित तौर पर छात्रों के प्रदर्शन में घुसकर हिंसा या अन्य आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिया।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि यह हजारों छात्रों के जीवन और भविष्य से जुड़ा सवाल है।
छात्रों के भविष्य को लेकर SC गंभीर
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि छात्रों के खिलाफ आपराधिक मामलों को देखते समय यह भी समझना होगा कि वे किस उद्देश्य से एकत्र हुए थे। कोर्ट ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने के छात्रों के अधिकार पर भी जोर दिया।पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून का उल्लंघन करने वाले मामलों को अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए।कोर्ट का संकेत है कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने वाले छात्रों और गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल लोगों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना जरूरी है।
गंभीर अपराधों के आरोपियों को राहत नहीं
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि करीब 2,873 लोगों के खिलाफ हत्या, दुष्कर्म और अपहरण जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामले हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को छात्रों के मामलों से अलग रखा जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR रद्द की जा सकती हैं, लेकिन प्रदर्शन में शामिल हुए असामाजिक तत्वों के खिलाफ जांच जारी रहनी चाहिए।वहीं, एक अन्य वकील ने दलील दी कि छात्रों को माफी या पछतावे से जुड़े हलफनामे दाखिल करने चाहिए। हालांकि, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने ऐसी कोई अनिवार्यता लगाने से इनकार किया और कहा कि इसकी जरूरत नहीं है।
हाई-पावर्ड कमेटी बनाने की तैयारी
सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित करने की अपनी मंशा भी दोहराई।
मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, प्रस्तावित समिति में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और पूर्व डीजीपी शामिल हो सकते हैं। कोर्ट ने बताया कि एक पूर्व CBI निदेशक और ऐसे पूर्व डीजीपी की सहमति भी मिल चुकी है, जो संबंधित राज्यों से नहीं हैं।पीठ ने सभी पक्षों को समिति के अधिकार क्षेत्र और कार्यक्षेत्र को लेकर लिखित सुझाव देने की अनुमति दी है।
महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर ऑनलाइन धमकियां मिलने का मुद्दा भी उठाया गया। वकीलों ने आरोप लगाया कि कुछ महिला प्रदर्शनकारियों को दुष्कर्म की धमकियां और आपत्तिजनक संदेश भेजे गए।यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ महिला प्रदर्शनकारियों के सोशल मीडिया अकाउंट हटा दिए गए, जबकि कथित उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई।मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया कि प्रस्तावित समिति इन शिकायतों की भी जांच करेगी।
पुलिस कार्रवाई पर भी उठे सवाल
प्रदर्शनकारियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि कुछ पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया।कुछ वकीलों ने कहा कि जिन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ वीडियो में कथित दुर्व्यवहार के सबूत मौजूद हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई समिति की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना होनी चाहिए।दिल्ली और बिहार पुलिस ने हालांकि अपने जवाबी हलफनामों में प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से इनकार किया है।
FIR पर अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने अभी छात्रों के खिलाफ सभी FIR रद्द करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है। पीठ मामले के अलग-अलग पहलुओं पर विचार कर रही है। खास तौर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों और गंभीर अपराधों के आरोपियों के बीच अंतर करने पर जोर दिया जा रहा है।आने वाले समय में कोर्ट का अंतिम आदेश और प्रस्तावित हाई-पावर्ड कमेटी का गठन छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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